खाकी का खौफ अपराधियों में कम आम जनता में ज्यादा..?

खाकी का खौफ अपराधियों में कम आम जनता में ज्यादा..?

अनोखी आवाज़@खरी-खरी
.नीरज द्विवेदी "राज"

आज तो मैं खरी-खरी कहता हूं;बुरा नही लगना चाहिए क्योंकि मैं जो देखता और सुनता हूं वही कहता हूं,यदि फिर भी बुरा लगता है तो मैं क्या करूँ..?

मुझे पसंद करने वालों की संख्या दिनों-दिन कम होती जा रही है ऐसी चर्चा हमसे जुड़े लोग मेल-मिलाप के दौरान करते है इसके पीछे का कारण पूछे जाने पर कहते है कि आपके बोलने और लिखने का अंदाज..।
खैर मुझे अफवाहकारियो और ना पसंद करने वालो से न कोई द्वेष है न कोई चिंता।

दूसरी बड़ी बात खाकी की भी निगाहें मेरे ऊपर रहती है, रहे भी क्यों न मैं किसी पुलिसकर्मी से बेवजह का आडंबर रूपी रिश्ता बना नही पाता जिस कारण ये सिताराधारी कटे-कटे रहते है और उनके दिल के बेहद करीब वो लोग रहते है जो उन्हें आडम्बर ही सही लेकिन मुंह पर खुश करने के लिए जीजा,फूफा, मौसा, चाचा,नाना, सहित तमाम रिश्तेदारी जोड़कर चरण चुम्बन करते है। खैर आजाद भारत मे सब स्वतंत्र है, चरण चुम्बन करें अथवा और कुछ चुम्बन...दौरा भी उसी का है... खैर मुझे क्या मैं तो ऐसे ही मन मे आया सो आप सबसे चर्चा कर लिया।

अब आते है मुद्दे पर एमपी पुलिस का ध्येय वाक्य देशभक्ति जनसेवा है लेकिन पुलिस इस ध्येय वाक्य का कितना अनुसरण कर रही है यह तो पुलिस ही बता सकती है साथ ही ज्यादा जानकारी के लिए जनता से भी पूछा जा सकता है। शायद जबाब यहीं मिलेगा की ध्येय वाक्य से कोई विशेष ताल्लुक अब नही रहा।
यदि बात सिंगरौली जिले की करे तो जिस वर्दी का खौफ़ गुंडो,अपराधियों में होना चाहिए उस वर्दी का खौफ़ आम जनता में ज्यादा है...? आम लोगो में खौफ रहे भी क्यो न थाने में पुलिसकर्मी कभी सीधे मुँह बात नहीं करते  बातचीत की शुरुआत माँ-बहन की गालियों से होती है। वही दूसरी ओर कोयला,डीजल,कबाड़, शराब,रेत का अवैध कारोबार करने वाले पुलिस के साथ चाय,सिगरेट व चाट-फुल्की खाते चौराहों पर नजर आ जाएंगे। बेवश जनता करे भी तो क्या..? किसे करे शिकायत वही राजा-वही मंत्री लिहाजा लोग भी वर्दी के खौफ से सहमे हुए है और अपराधी बेखौफ होते जा रहे है। जिस कारण वर्दी पर भी अटैक करने में रत्ती भर संकोच नही करते कई बार पुलिसकर्मियो को जलील होकर आना पड़ता है। पुराना रिकॉर्ड उठा लिया जाए तो कई जीते-जागते उदाहरण सामने देखने को मिल जाएंगे,लेकिन इतना सबकुछ होने के बाद भी  ईमानदारी नाम की कोई चीज नही दिख रही है। पहले पुलिस के डंडे से अपराधियों गुंडों से सिर फूटते थे लेकिन अब ठीक इसके विपरीत हो रहा है। कहने को यू तो वर्दी की नही हमदर्दी की बात करेंगे लेकिन जनता के प्रति कुछ इस तरह की हमदर्दी है कि किसी मामले की रिपोर्ट लिखवाने यदि बिना राजनीति सिफारिश के जाए तो पुलिसकर्मियों द्वारा ऐसा व्यवहार किया जाता है मानो उनके सामने फरियादी नही बल्कि मुजरिम खड़ा हो, ऐसी तैसी करने के बाद फरियादी को रिपोर्ट की प्रति देकर एहशान किया जाता है। वही आपराधिक और सरहंगों कि बखूबी मेहमान नवाजी होती है दूसरी बड़ी बिडम्बना तो देखिए यदि सामान्य लोगो के ऊपर  3-4 मारपीट के मुकदमे भी पंजीबद्ध है तो उसका जिला बदर होना तय है...? लेकिन यदि व्यक्ति खास है और राजनेताओं का संरक्षण हो तो 3-4 मुकदमे नही 1-2 दर्जन भी फिर भी चलेगा...जिसके कई उदाहरण आपके आसपास देखने को मिल जाएंगे ।पुलिस का यह दोहरा चरित्र मेरी समझ से परे है लेकिन इतना तो समझना होगा कि जो व्यक्ति
आपसे कुछ नही बोल सकता है वह ईश्वर से फरियाद तो कर सकता है इसलिए कहा गया है।

"दुर्बल को ना सताइये,वां की मोटी हाय
बिना साँस की चाम से,लोह भसम होई जाय"

हालांकि यह बात सभी जगह लागू हो ऐसा मैं  बिल्कुल दावा नही करता । लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि कुछ लोग ऐसे है जो अपनी नकली चेहरे से आम लोगों को यह बताना चाहते है कि वे राजा हरिश्चन्द्र के परिवार से ताल्लुक रखते है,ऐसे लोगो को समझने की आवश्यकता है ये जनता है सब जानती है बोलती भले कुछ नहीं।

खैर राज काज है चलते आ रहा है चलते रहेगा...किसी दूसरे के साथ अन्याय होता देख जनता सोंचती है की मेरे साथ नहीं हो रहा हम क्यों उलझे। लेकिन उसे क्या पता अगला नंबर हमारा है। जब इतनी बातें कर ही लिया तो यह भी बता दु की मेरे(खबर लिखने वाला) साथ भी यदि कुछ हो तो आश्चर्य में न पड़े ये पुलिस है ये कहावत तो आप सब बखूबी सुने होंगे "पुलिस की दोस्ती और दुश्मनी दोनों अच्छी नही होती। लिहाजा इन्हें चाटुकार ही पसंद है लेकिन मेरा दुर्भाग्य रहा है कि मैं अभी तक सिख नही सका।

खैर सबको मुफ्त की सलाह देता हूं इसलिए ऐसे लोगो को भी दे दु नही तो कुछ ज्यादा बुरा मान जाएंगे सलाह यह है की यह श्रृंगी ऋषि की तपोस्थली है समेटकर  ले जाना आसान नहीं है।