सिंगरौली:कांग्रेस इस बार मेयर का किसको देगी टिकट और कौन बनेगा बागी...?

सिंगरौली:कांग्रेस इस बार मेयर का किसको देगी टिकट और कौन बनेगा बागी...?

अनोखी आवाज़@मुद्दे की बात
नीरज द्विवेदी के साथ

सिंगरौली। मध्यप्रदेश की जनता ने एक लंबे समय बाद प्रदेश की बागडोर कांग्रेस के हांथो में सौंपी थी,लेकिन महज 15 महीने में क्या हुआ यह आप सब भली- भांति जानते है। इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण जो मुझे समझ आता है वो यह था कि गुंटबाजी और कुर्सी की लड़ाई। जिस तरह बीते दिवस रीवा कार्यकर्ता सम्मेलन में प्रदेशाध्यक्ष कमलनाथ ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा था कि यदि विन्ध्य से सीट मिलती तो ऐसे दिन देखने को नहीं मिलते। मेरे ख्याल से पूर्व मुख्यमंत्री कलमनाथ को यह समझना चाहिए कि जब तक गुंटबाजी रहेगी तब तक हमे लगता है ऐसे ही दिन हमेशा देखने को मिलेंगे..?

खैर आज के मुद्दे की बात तो यह है कि इस बार ऊर्जाधानी में कांग्रेस मेयर का टिकट किसे देती है और कौन बागी बनेगा यह देखना बेहद दिलचस्प होगा।


ऐसा इसलिए क्योकि बीते विधानसभा चुनाव में वर्तमान जिलाध्यक्ष अरविंद सिंह चंदेल आस लगाए बैठे थे कि टिकट मिलेगा लेकिन हुआ इसके विपरीत कांग्रेस ने रेनू शाह को अपना प्रत्याशी बनाया लिहाजा सिंह साहब पार्टी को बाय.. बाय कहते हुए ट्रैक्टर में सवार हो गए जिसका परिणाम यह रहा कि सिंह साहब ने अपना तो शक्ति प्रदर्शन दिखा दिया लेकिन रेनू शाह की नाव मंझदार में डूब गई इतना ही नही समूचे विन्ध्य में कांग्रेस की नाव भी डूब गई। जोर-जुगाड़ में सरकार बनी लेकिन भाजपा की सत्ता के भूख के आगे कुछ ही दिनों में उथल-पुथल हो गई। इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी गुटबाजी अभी भी खत्म नही हुई है,पहले की अपेक्षा और बढ़ी है। खासकर सिंगरौली में तो सबको स्पष्ठ दिखती भी है। एक शहर में 2 कार्यालय लेकिन नेता है कि इसे मानने को तैयार नही है।

उनका तो एक ही नारा है कि परिवार बड़ा होगा तो मतभेद थोड़ा बहुत होता है लेकिन उन्हें समझना पड़ेगा कि मतभेद ही नही मनभेद भी है। कुछ नेता तो ऐसे भी है जिनको पार्टी,गुटबाजी से कोई विशेष मतलब नही है उनकी ठेकेदारी चलनी चाहिए और बड़ी-बड़ी गाड़ियों पर सामने पद लिखा होना चाहिए। खैर चर्चा यह है कि इस बार नगरीय निकाय चुनाव में फतेह की जिम्मेदारी अरविंद सिंह चंदेल के कंधों पर  वरिष्ठ नेताओं ने सौंपी है ऐसे में जाहिर सी बात है कि टिकट वितरण का काम सिंह साहब से होकर ही गुजरेगा । लिहाजा दूसरे खेमे के लोगो को निराशा हाथ लग सकती है यदि कही चर्चा की बातें हकीकत में बदली तो कोई न कोई बागी जरूर पैदा होगा। और कही ऐसे हुआ तो विधानसभा जैसे स्थिति निर्मित होगी। हालांकि अभी चुनाव होना बाकी है ऐसे में कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व क्या निर्णय लेता है यह देखना बेहद दिलचस्प होगा।