‘‘सूरत’’ का सच! ‘‘निर्विरोध अथवा ‘‘विरोध’’ पर ‘सत्ता बल’ भारी?

‘‘निर्विरोध’’ चुनाव सूरत!

वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव की जिस धमाकेदार तरीके से आगाज भाजपा खास कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने की है, इसकी एक बानगी ‘‘हीरा’’ नगरी ‘‘सूरत’’ से भाजपा उम्मीदवार मुकेश दलाल का निर्विरोध चुना जाना है। भाजपा के इतिहास में वे पहले निर्विरोध सांसद होकर एक साथ ‘हीरा’ और ‘‘हीरो’’ बन गए हैं। 400 पार के हुंकार के चलते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ‘‘पहला कदम’’ पहला ‘कमल’ ‘‘मुकेश’’ के रूप में मिला। हाल के वर्षों में सांसद के निर्विरोध चुनाव के उदाहरण देखने को मिलते नहीं हैं। वर्ष 2012 में समाजवादी पार्टी की डिंपल यादव का कन्नौज लोकसभा उपचुनाव में निर्विरोध सांसद के चुनाव को छोड़ दे तो, अंतिम बार वर्ष 1989 में मोहम्मद शफी भट जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉंफ्रंेस पार्टी से श्रीनगर लोकसभा से निर्विरोध चुने गये थे। शायद इसका कारण विद्रोह व आतंकवाद के चलते (जहां राज्य की शेष सीट पर मात्र 5 प्रतिशत से भी कम मतदान हुआ था) दूसरे उम्मीदवार द्वारा नामांकन न भरना रहा था। स्वतंत्र भारत के इतिहास में अभी तक कुल 35 सांसद निर्विरोध चुने जा चुके हैं। अभी अरुणाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी 10 भाजपा उम्मीदवार निर्विरोध जीते हैं।

रवीश कुमार की प्रतिक्रिया एकतरफा।

इस ‘‘निर्विरोध’’ चुनाव को लेकर कांग्रेस और सोशल मीडिया खासकर प्रसिद्ध पत्रकार रवीश कुमार की जो प्रतिक्रिया आई है, वह किसी भी रूप में न तो उचित कही जा सकती है और न हीं तथ्यों से मिलान खाती है। आम आदमी पार्टी द्वारा इस निर्विरोध चुनाव को ‘‘लोकतंत्र की नींव खोखला कर देने वाला’’ ठहराया। सोशल मीडिया में सूरत लोकसभा के निर्विरोध चुनाव को लेकर लोकतंत्र की हत्या बताने वाले डिंपल यादव के निर्विरोध निर्वाचन पर कहां गायब हो गए थे? पत्रकारिता के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय रैमान मेगसेसे’ पुरस्कार से नवाजे गये रवीश कुमार एक ऐसे निर्भीक, खोजी पत्रकार हैं, जिनके प्रशंसक, फॉलोअर्स सोशल मीडिया में लाखों की संख्या में है (लगभग 80 लाख से अधिक सब्सक्राइबर (ग्राहक) है), उनमें से एक प्रशंसक मैं भी हूं। वह इसलिए की उनकी पत्रकारिता अन्य पत्रकारों की ‘‘मीडिया ट्रायल’’ पत्रकारिता (जैसे अर्णब गोस्वामी) की तुलना में ज्यादा तथ्योंपरक और आम जनों की समस्याओं से ज्यादा जुड़ी रहती हैं। युवाओं की बेरोजगारी, शिक्षा, परीक्षा, नकल, किसान आंदोलन, वन रैंक वन पेशन, ओआसी, अग्निवीर योजना साम्प्रदायिक सदभाव और इन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण नागरिक, सामाजिक सक्रियतावादी (एक्टिविस्ट) एवं पत्रकारों की नागरिक स्वतंत्रता पर अतिक्रमण करने वाली घटनाओं का विस्तृत विवरण सहित अनेकोंनेक जन समस्याओं पर उन्होंने पत्रकारिता की कई सीरीज की हैं, जिन्हें पत्रकारों की बड़ी जमात उठाने में सामान्यतः परहेज करती रही है। बावजूद इसके उन्हें भी पूर्ण रूप से एक ‘‘निष्पक्ष’’ पत्रकार की श्रेणी में इसलिए ‘‘नहीं’’ रखा जा सकता है, कि अधिकांशतः सरकार की आलोचना के अतिरिक्त रवीश कुमार को कभी भी सरकार के अच्छें कार्यों को लेकर वीडियो बनाते हुए या पीठ थपथपाते हुए समाचार देते हुए शायद ही देखा गया हो? जैसे ‘‘चंचल नार की चाल छिपाये न छिपे’’ वैसे ही रवीश कुमार का वर्तमान सत्ता का अंध विरोध छिपता नहीं है। अपने इस रुख के लिए ऐसे पत्रकार इस आदर्श सिद्धांत के पालन का सहारा लेते है कि पत्रकार का कार्य सिर्फ सत्तापक्ष से ही प्रश्न पूछना है, विपक्ष से बिल्कुल नहीं।

रवीश कुमार! संतुलित नहीं बल्कि अंध भक्त विरोध।

रवीश कुमार की पत्रकारिता की आलोचना-समालोचना में देश के ‘‘तंत्र’’ को बचाए रखने की चिंता अवश्य झलकती रहती है, परंतु यहां पर तो निश्चित रूप से उन्होंने अंधभक्त मीडिया जिसे वे स्वयं गोदी मीडिया कहते थकते नहीं हैं, के समान ही अंध भक्त विरोध का चश्मा लगाते हुए सूरत लोकसभा चुनाव के परिणाम की बेमैल तुलना चंडीगढ़ मेयर चुनाव के साथ कर दी। इसे ‘‘मैच फिक्सिंग’’ तक करार कर दिया, जिसका आगे अर्थ स्पष्ट किया गया है। कुछ अन्य यूटूबरर्स ने सूरत चुनाव को चंडीगढ़ मेयर चुनाव से भी ज्यादा खतरनाक ठहरा दिया। इसे तो बिल्कुल ‘‘जलेबी के समान सीधा’’ विश्लेषण ही कहा जा सकता है, जो किसी भी रूप में न तो तथ्यात्मक है और न ही सही है। चंडीगढ़ मेयर चुनाव में स्वयं चुनाव अधिकारी द्वारा कैमरे के सामने सरेआम वोटों का डाका ड़ाला गया था, जबकि यहां पर तो बिना कैमरे के ही सूरत की राजनीतिक रूप से प्रसिद्ध फाइव स्टार होटल ‘‘ली मेरिडियन’’ ने अपना इतिहास दोहरा दिया। जरा आपको याद दिला दें कि इसी ‘‘स्टार’’ होटल में महाराष्ट्र में जब शिवसेना में दो फाड़ होकर महा विकास आधाड़ी की सरकार गिराए जाने का ‘‘ऑपरेशन लोटस’’ चल रहा था, तब पाला बदलने वाले विधायकों को यहीं ठहराया गया था। सूरत चुनाव के संबंध में रवीश कुमार द्वारा तीन-तीन वीडियो बनाना, उनके एजेंडे को स्पष्ट रूप से संकेत करता है। यदि आप उनके इन वीडियो को पूरा देखेंगे (जैसा कि वे हमेशा कहते हैं कि वीडियो पूरा देखिए) तो उससे यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाएगा कि ये वीडियो रवीश कुमार का पूर्णतः अंध भक्त विरोध के एजेंडा का एक भाग ही है, बजाय देश की लोकतंत्र की चिंता का विषय, जैसा कि वह कहते हैं, दावा करते हैंं।

रवीश कुमार कांग्रेस नेतृत्व की कमजोरी को नजरअंदाज करना!

रवीश कुमार का उक्त वीडियो में यह कहना कि यदि विपक्ष के उम्मीदवार को इस तरह से ‘‘मैनेज’’ किया जाने लगा और प्रस्तावक गायब होने लगे तो कहीं लोकतंत्र ही गायब न हो जाय? उच्चतम न्यायालय से तुरंत हस्तक्षेप करने की गुजारिश भी रवीश कुमार ने कर डाली। ‘‘ऑपरेशन निर्विरोध’’ या ‘‘ऑपरेशन दलाल’’ की ‘‘दलाली’’ किसने की, यह तो जांच के बाद ही पता चल जायेगा। परंतु ‘‘चलती चक्की में से साबुत निकल आने वाले’’ रवीश कुमार निश्चित रूप से यदि यह कहना चाहते हैं कि जिस प्रकार भ्रष्टाचार में लेने वाला व देने वाला दोनो बराबरी के अपराधी होते हैं। ठीक उसी प्रकार लोकतंत्र के इस चुनावी खेल में नेताओं, सांसदों, विधायकों और अब ‘‘उम्मीदवारों’’ का बिकना जो एक आम चलन (प्रक्रिया) हो गई है, के लिए दोनों पक्ष आपराधिक रूप से कानूनन् दोषी है। तकनीकी रूप से सही होने के बावजूद रवीश कुमार की निष्पक्षता स्पष्ट रूप से एक पक्ष की ओर 180 डिग्री नहीं तो 90 डिग्री से जरूर झुकती हुई दिखती है, जब वे कांग्रेस की इस बात के लिए बिल्कुल भी आलोचना नहीं करते हैं, नजरअंदाज कर देते है कि कांग्रेस को अपना घर संभालना नहीं आ रहा है। विपरीत इसके वे सीधे उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप की मांग कर बैठते हैं। क्या यह कांग्रेस नेतृत्व (प्रादेशिक व केन्द्रीय) की जिम्मेदारी नहीं थी कि जिस व्यक्ति को वह उम्मीदवार बना रहे है, वह इतना कमजोर व दोगला (जो बाद में अंततः भाजपा में शामिल ही हो गया) और ‘‘आप अपने हाथ बिकने वाला चकरया’’ निकल जाएगा? वह पार्टी को धोखा देकर विपक्षी से मिलकर ‘‘ऑपरेशन निर्विरोध’’ सफल कर ‘‘निर्विरोध’’ चुनाव का रास्ता बना कर सूरत के 16 लाख वोटो के मताधिकार को छीन लेगा? आखिर यह घटना कुछ घंटे या 1 दिन की तो थी नहीं? इसकी भूमिका कहीं न कहीं 3-4 दिनों से बन रही थी, जैसा कि स्थानीय मीडिया में छपा भी है। सूरत की यह कहानी अभी इंदौर लोकसभा में दोहराई जा रही है, जहां कांग्रेस उम्मीदवार ने अपना पर्चा वापिस लेकर भाजपा में शामिल हो गया।

निर्विरोध चुनाव की परिस्थितियों की जांच आवश्यक।

इस निर्विरोध चुनाव के दूसरे पहलू जिस पर रवीश कुमार ज्यादा जोर देते है, पर भी विचार किया जाना चाहिए। क्या यह निर्विरोध चुनाव एक सामान्य प्रक्रिया के तहत हुआ है? अर्थात सामान्य प्रक्रिया के तहत पानी का बहाव उतार की ओर हुआ है अथवा मोटर पंप से पानी चढ़ाव की ओर उतारा गया है? क्या इस प्रक्रिया में राज्य पुलिस बल, केंद्रीय एजेंसीस ई.डी. आदि का धन-बल, धमकी ड़र का भी समावेश हुआ है? यह निष्कर्ष तो एक स्वतंत्र जांच आयोग की रिपोर्ट के बाद ही निकाला जा सकता है। हस्ताक्षर को जाली ठहराकर अस्वीकार करने वाले शपथ पत्र के हस्ताक्षर के सत्यापन की जांच किसने की? जब वे तीनों प्रस्तावक निर्वाचन अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत ही नहीं हुए? निर्वाचन अधिकारी अथवा कांग्रेस सहित विपक्षी पार्टियों द्वारा झूठे हस्ताक्षर के लिए प्रस्तावकों के विरुद्ध अभी तक एक भी प्रथम प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं कराई? सरदार वल्लभ भाई पटेल, ग्लोबल रिपब्लिकन पार्टी सहित छोटे दलों के 4 प्रत्याशियों सहित शेष समस्त निर्दलीय प्रत्याशी ने भी नामांकन वापस ले लिये। बसपा प्रत्याशी को क्राईम ब्रांच उठाकर ले गई और तदनुसार उनका फार्म वापिस हो गया। तथापि इस तथ्य को भी ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि सूरत में भाजपा 1984 से लगातार जीतते चली आ रही है। जहां पर वर्तमान समस्त विधायक व सभासद (पार्षद) भाजपा के ही हैं, व इस चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार की पूर्व की ही भांति लाखों मतों से जीतने का एक अनुमान/आकलन है।
अंत में मैं यह जरूर चाहूंगा कि पाठक गण मेरे इस लेख को रवीश कुमार तक जरूर पहुंचाएं, जिससे वे इसे पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें, ताकि कोई त्रुटियां (यदि) तथ्यात्मक अथवा गुण दोष के आधार पर उनकी नजर में इस लेख में हैं, तो तदनुसार सुधारा जा सके।

 

 

 

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