क्या लोकसभा चुनाव में जीत की गारंटी ‘‘एम’’ ‘M’ अक्षर हो गया है? ‘‘एम’’ किसका ‘‘मंगल-अमंगल’’ करेगा?

अनोखी आवाज़। वर्ष 2024 के हो रहे लोकसभा चुनाव के अभी तक छह चरणों के मतदान हो चुके हैं। अब एक आखिरी सातवां चरण रह गया है, जहां 1 जून को मतदान होना है। 16 मार्च को केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा लोकसभा चुनाव की तिथियां की घोषणा करने के बाद लगभग  साढे़ तीन महीनों से चले आ रहे इस चुनाव प्रचार की सबसे महत्वपूर्ण खासियत यह रही कि न केवल नरेटिव के विषय बदलते रहे, बल्कि नरेटिव एवं परसेप्शन बनाने वाली पार्टियां भाजपा-कांग्रेस भी नरेटिव फिक्स करने में एक दूसरे को शह-मात देती रही। सातवें चरण के समय चुनाव प्रचार का पहुंचा ‘‘निम्न स्तर’’ क्या ‘‘सातवें आसमान’’ पर पहुंचेगा, यह देखना भी बड़ा दिलचस्प होगा।

पहले चार चरणों में कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र के आधार पर नरेटिव फिक्स किया और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उस नरेटिव को खारिज करने में थकते हुए इस तरह उलझ गए कि कई बार वे कांग्रेस के समान ‘‘आत्मघाती गोल’’ मारते हुए दिखे। बाद के चरणों में जरूर कांग्रेस नरेटिव फिक्स करने में पिछड़ सी गई। बावजूद इसके इस बार पहले चरण के चुनाव प्रचार से लेकर छठवें चरण के चुनाव प्रचार तक यदि मुद्दों व परसेप्शनस् को देखें तो वे लगातार बदलते रहे हैं। परंतु इन बदलते मुद्दों के बावजूद इनमें एक चीज बहुत ही कामन रही, वह ‘‘एम’’ ‘M’ वर्ण (अक्षर) से प्रारंभ होने वाले शब्दों का ‘‘प्रयोग’’। कुछ शब्द निम्नानुसार है, जिनका उपयोग बहुतायत से बेधड़क बार-बार किया जाता रहा है।

‘‘महिला, मंगलसूत्र, मायावती, ममता, मालीवाल (स्वाति), महामहिम (राज्यपाल एवं न्यायाधीश), एमपी, एमएलए, महिमा-मंडन, मंडल- क-मंडल, मत, मत-मतांतर, मंदिर, मस्जिद, मुस्लिम, मुगल, मुगलिया, मुस्लिम लीग, माफिया, मटन, मछली, मुजरा, मथुरा, महाराष्ट्र, मणिपुर, मुद्दे, महंगाई, महाशक्ति, मानसिक संतुलन, मनी पावर, मसल पावर, माब पावर, मीडिया पावर, ‘‘मोदी’’?’’

महत्वपूर्ण प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि इनमें से कौन से ‘‘एम’’ एनडीए के लिए ‘‘जीत का आधार’’ हो सकते हैं और कौन से ‘‘एम’’ इंडिया के लिए ‘‘उत्प्रेरक’’ हो सकते हैं। आईये! इसका थोड़ा विश्लेषण करने का प्रयास करते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलसूत्र, मुस्लिम, मुगल, मुगलिया, मुस्लिम लीग, मटन, मछली और मुजरा शब्दों का प्रयोग करके एक विशिष्ट वर्ग को लेकर कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति पर लगातार जोरदार हमला बोला है। अब इसका कितना फायदा ‘‘एनडीए’’ अथवा ‘‘इंडिया’’ को मिलेगा, यह तो 4 तारीख को ही पता चल पाएगा। परंतु निश्चित रूप से इन शब्दों के उपयोग से सांप्रदायिक धु्रर्वीकरण को बढ़ावा अवश्य मिला है, ऐसा प्रतीत होता है। साथ ही यह बात भी समझ से परे है कि भाजपा ने पिछले 5 सालों में जो महत्वपूर्ण कार्य किए, निर्णय लिए, संविधान संशोधन विधेयक पारित किये, उन सब उपलब्धियों के आधार पर नरेन्द्र मोदी ने प्रायः वोट क्यों नहीं मांगे?

नोटबंदी, अग्निवीर योजना, धारा 370, ट्रिपल तलाक जैसी उपलब्धियों की चुनावी प्रचार में लगातार चर्चा न करना समझ से परे है। इसका एक दूसरा अर्थ यह निकलता है कि शायद ये मुद्दे जनता की नजर में उपलब्धियां नहीं है, बल्कि जनता शायद इनसे परेशान रही है। इसलिए इन मुद्दों का कहीं विपरीत प्रभाव चुनावी परिणाम पर न भुगतना पड़े, शायद इसलिए इन मुद्दों को ज्यादा उछाला न जाए की नीति भाजपा ने अपनाई।

जहां मोदी विपक्ष पर तंज कसने को लेकर प्रायः एम अक्षर को प्रमुखता देते रहे, वहीं विपक्ष ने तो लगभग सारे वर्णो (52) का उपयोग कर मोदी को अपशब्द बोलने में कोई परहेज नहीं किया, यहां तक कि कब्र खोदने की बात तक कह ड़ाली।
अंत में एक ‘एम’ को चुनावी राजनीति का मुद्दा न बनाया जाना भी थोड़ा अचभिंत व आश्चर्यचकित करने वाला है। यह ‘एम’ मरकज निजामुद्दीन तबलीगी जमात के मौलवी मोहम्मद साद जो कोरोना के महासंकटकाल में 2 हजार लोगों का जलसा कर ऐसी गलती कर गये, जिससे कोरोना देश के विभिन्न जगहों पर इतना फैल गया कि केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय तक को देश के इतिहास में तबलीगी जमात के कारण पीड़ित कोरोना मरीजों को संख्या को समय-समय पर जारी अपने स्वास्थ्य बुलेटिन में पृथक से देनी पड़ी थी। बीमारी के संबंध में इस तरह के वर्ग के आधार पर विभाजित आकड़े इसके पूर्व अभी देखने को नहीं मिले। मामले ने इतना तूल पकड़ा कि मामले की गंभीरता का देखते हुए मोहम्मद साद के खिलाफ प्राथमिकी तक दर्ज की गई, जिसका बाद में आज तक कोई अता-पता जनता की तो छोड़िये; सरकारों की विभिन्न जांच एजेसीयों तक को नहीं मालूम है। देश के ‘तंत्र’, जन-तंत्र के भूलने का इससे बड़ा उदाहरण शायद ही कोई होगा। यह चुनावी मुद्दा किसी भी पक्ष के लिए नहीं है, यह भी एक दुखद पहलू है।

राजीव खण्डेलवाल
(लेखक, कर सलाहकार एवं पूर्व बैतूल सुधार न्यास अध्यक्ष हैं) 

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